स्वास्थ्य के क्षेत्र से होने के नाते मैं यकीनन कह सकता हूं कि समाज आज जबरदस्त तनाव में है। अवसाद हर दिन, हर तरफ पांव पसार रहा है, कोई नहीं बचा इससे। इसमें बच्चे भी हैं, बड़े व बुजुर्ग भी। घर में ही एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे हैं। छोटे-छोटे बच्चे तक नहीं बचे हैं इससे। कई मामलों में वह हिंसक तक हुए हैं।
अपने तर्जुबे के आधार पर कह सकता हूं कि इसकी बुनियाद में परिवारों का बिखरना और रिश्तों का तार-तार होना है। मेरे लिए राम का चरित्र यहीं अहम हो जाता है। वह हर पग पर नए रिश्ते बनाते हैं। बने-बनाए रिश्तों को बखूबी निभाते भी हैं। इसी रूप में राम मेरे सबसे नजदीक हैं। राज मिलने पर राम न खुश होते हैं, न वन गमन पर आक्रोशित।
राम होने का मतलब ही है कि सहजता से प्रतिकूल बदलावों को भी स्वीकार कर लें। वनवास मिलने पर भी व्यवहार में बदलाव न आना रामत्व है और रावण को शिकस्त देने का श्रेय खुद न लेना भी।
प्रिय मुझे तुलसी के राम हैं, जो शौर्य को भी धारण करते हैं, धैर्य को भी। फिर भी स्वभाव पर भारी कोमलता, सहृदयता और शरणागत वत्सलता ही है। राम प्रेम और मर्यादा के संगम हैं। वह कभी भी मर्यादा नहीं लांघते। युद्ध भूमि भी इसका अपवाद नहीं, किसी को कष्ट नहीं देते।