सार
Narendra Dabholkar Murder Case: सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत ने 10 मई को अपना फैसला सुना दिया है। 2013 में दाभोलकर की हत्या पुणे में कर दी गई थी। 2014 में इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया था।
विस्तार
सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत ने फैसला सुना दिया है। पुणे की एक अदालत ने दाभोलकर की हत्या के मामले में आज दो आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन को बरी कर दिया। दाभोलकर महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए जाने जाते थे। 2013 में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी। मई 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दाभोलकर हत्या मामले को सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था।
आइये जानते हैं कि नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कब हुई थी? पूरी घटना क्या थी? मामला सीबीआई तक कैसे पहुंचा? आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? अदालत में क्या हुआ? अभी इस मामले में क्या हुआ है
नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कब हुई थी?
20 अगस्त 2013 को पुणे में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी थी। घटना के वक्त दाभोलकर सुबह की सैर के लिए घर से निकले। ओमकारेश्वर (महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे) पुल पर सुबह 7:15 बजे दाभोलकर पर हमला किया गया। दाभोलकर पर पांच गोलियां चलाई गईं। दो गोलियां मिसफायर हुईं, लेकिन दो गोलियां दाभोलकर के सिर में और एक छाती में लगीं। जब वे गिर पड़े, तो दोनों हमलावर पास में खड़ी एक मोटरसाइकिल से भाग निकले। दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई।
दो जाने-माने हिस्ट्रीशीटर दाभोलकर की हत्या में मुख्य संदिग्ध के रूप में नामित किए गए थे। आरोपियों को घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। हिस्ट्रीशीटर के पास से हथियार और कारतूस बरामद हुए थे जो दाभोलकर के शरीर से बरामद गोलियों से मेल खाते थे। हालांकि, दोनों संदिग्धों पर कभी औपचारिक रूप से हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और इसके तुरंत बाद उन्हें जमानत दे दी गई। इस मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।
20 अगस्त 2013 को पुणे में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी थी। घटना के वक्त दाभोलकर सुबह की सैर के लिए घर से निकले। ओमकारेश्वर (महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे) पुल पर सुबह 7:15 बजे दाभोलकर पर हमला किया गया। दाभोलकर पर पांच गोलियां चलाई गईं। दो गोलियां मिसफायर हुईं, लेकिन दो गोलियां दाभोलकर के सिर में और एक छाती में लगीं। जब वे गिर पड़े, तो दोनों हमलावर पास में खड़ी एक मोटरसाइकिल से भाग निकले। दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई।
दो जाने-माने हिस्ट्रीशीटर दाभोलकर की हत्या में मुख्य संदिग्ध के रूप में नामित किए गए थे। आरोपियों को घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। हिस्ट्रीशीटर के पास से हथियार और कारतूस बरामद हुए थे जो दाभोलकर के शरीर से बरामद गोलियों से मेल खाते थे। हालांकि, दोनों संदिग्धों पर कभी औपचारिक रूप से हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और इसके तुरंत बाद उन्हें जमानत दे दी गई। इस मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।
दाभोलकर की हत्या के बाद महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी कानून लागू
दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सर्जन अमित थडानी की पुस्तक 'रेशनलिस्ट मर्डर्स' में लिखते हैं कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने डॉ. दाभोलकर की हत्या को प्रगतिशील महाराष्ट्र की छवि पर आघात बताया था। एक साक्षात्कार में चव्हाण ने दावा किया था कि गोडसे की विचारधारा मानने वाले लोग दाभोलकर की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं। उधर राज्य में अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करने की जबरदस्त बहस चल रही थी।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अंधविश्वास विरोधी विधेयक पारित करवाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि जिस प्रगतिशील विचार के लिए उन्होंने अपनी जान दी, वह राज्य में नहीं मरेगा। ऐसा लगता है कि उनके विचारों के खिलाफ किसी ने उनकी हत्या की। अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के प्रमुख श्याम मानव ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में फासीवादी मानसिकता अपनी सीमा पार कर चुकी है और इसे समाज के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बताया। इस बीच चव्हाण के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करा दिया, जिसे वह 2003 से पारित कराना चाहती थी। दूसरी ओर डॉ. दाभोलकर की हत्या का मामला भी लगातार चर्चा में बना हुआ था।
दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सर्जन अमित थडानी की पुस्तक 'रेशनलिस्ट मर्डर्स' में लिखते हैं कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने डॉ. दाभोलकर की हत्या को प्रगतिशील महाराष्ट्र की छवि पर आघात बताया था। एक साक्षात्कार में चव्हाण ने दावा किया था कि गोडसे की विचारधारा मानने वाले लोग दाभोलकर की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं। उधर राज्य में अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करने की जबरदस्त बहस चल रही थी।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अंधविश्वास विरोधी विधेयक पारित करवाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि जिस प्रगतिशील विचार के लिए उन्होंने अपनी जान दी, वह राज्य में नहीं मरेगा। ऐसा लगता है कि उनके विचारों के खिलाफ किसी ने उनकी हत्या की। अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के प्रमुख श्याम मानव ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में फासीवादी मानसिकता अपनी सीमा पार कर चुकी है और इसे समाज के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बताया। इस बीच चव्हाण के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करा दिया, जिसे वह 2003 से पारित कराना चाहती थी। दूसरी ओर डॉ. दाभोलकर की हत्या का मामला भी लगातार चर्चा में बना हुआ था।
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