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Shiv Sena: शिवसेना में टूट, फिर चुनाव आयोग और अदालत में क्या हुआ? जानें अब स्पीकर के फैसले का क्या असर होगा

 सार

Shiv Sena MLAs Disqualification Case: जून 2022 में शिवसेना में टूट हई थी। इसके बाद एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे वाले दो गुटों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिकाएं दायर कर दलबदल विरोधी कानूनों का हवाला देते हुए एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी




विस्तार

आज महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बड़ा दिन है। यहां बुधवार को शिवसेना के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट के विधायकों की अयोग्यता पर फैसला होगा। अयोग्यता का फैसला महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष राहुल नार्वेकर सुनाएंगे, जिसका आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिया था। फैसले से पहले ही राज्य की राजनीति में बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है। उद्धव गुट वाली शिवसेना ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ विधानसभा अध्यक्ष की मुलाकात को लेकर निशाना साधा है। आरोपों का पलटवार करते हुए नार्वेकर ने कहा कि निर्णय कानून के अनुसार होगा। 

अयोग्यता का निर्णय न केवल एकनाथ शिंदे सरकार का भविष्य तय करेगा, बल्कि इसका असर आगे लोकसभा चुनाव में भी पड़ सकता है। जून 2022 में उद्धव गुट से अलग होने के बाद शिंदे और उनके गुट के लिए बड़ी परीक्षा होगी।


आइए जानते हैं कि शिवसेना विधायकों की अयोग्यता का मामला क्या है? शिवसेना में बगावत के बाद क्या-क्या हुआ? मामला अदालत में कैसे पहुंचा और वहां क्या फैसला आया? मामले में अभी क्या हो रहा है? फैसला का असर क्या होगा

शिवसेना विधायकों की अयोग्यता का पूरा मामला क्या है?
जून 2022 में टूट के बाद एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे चुनाव आयोग से लेकर अदालत तक शिवसेना को अपनी पार्टी बताने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों गुटों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष 34 याचिकाएं दायर की हैं। इनमें खुद को असली पार्टी बताने और दलबदल विरोधी कानूनों का हवाला देते हुए एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।

Shiv Sena Disqualification Case Verdict Rift To EC Know Impact of Speaker's Decisions
एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे - फोटो : सोशल मीडिया
अयोग्यता का मामला शुरू कैसे हुआ?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने से पहले पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को जानना होगा। अक्तूबर 2019 में महाराष्ट्र में हुए चुनाव में 288 सदस्यीय विधानसभा में 104 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। वहीं चुनाव में भाजपा की साथी शिवसेना के 56 विधायक जीते। विपक्ष में एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं। बाकी अन्य 29 सीटों पर छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। 

चुनाव के बाद शिवसेना और भाजपा में ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान हुई और बात न बनने पर गठबंधन टूट गया। भाजपा से अलग होने के बाद नवंबर 2019 में शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ राज्य में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। 

शिवसेना में बगावत क्यों हुई?
सरकार गठन के ढाई साल बाद 20 जून 2022 को शिवसेना में बगावत हो गई। एमएलसी चुनाव में शिवसेना के कई विधायकों ने भाजपा के उम्मीदवार को वोट किया। एक दिन बाद यानी 21 जून को ही उद्धव ठाकरे से नाखुश चल रहे विधायक सूरत चले गए। इन विधायकों का नेतृत्व कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे कर रहे थे। यहां से ये सभी गुवाहाटी पहुंचे। इन विधायकों को मनाने के लिए 22 जून को शिवसेना प्रमुख के कहने पर तीन नेताओं का प्रतिनिधिमंडल बागी विधायकों से मिलने पहुंचा। हालांकि, कुछ बात नहीं बनी। 

शिंदे गुट ने भाजपा से साथ सरकार बनाई
इसके बाद करीब छह दिन बाद तक उद्धव शिंदे गुट को मनाने में जुटे रहे, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। इस बीच उद्धव ठाकरे गुट की शिकायत पर डिप्टी स्पीकर ने 16 बागी विधायकों को अयोग्यता का नोटिस दे दिया। इसके खिलाफ शिंदे गुट सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर की कार्रवाई पर 12 जुलाई तक रोक लगा दी।

उधर, भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से मिलकर फ्लोर टेस्ट की मांग कर दी। राज्यपाल ने भी इसके लिए आदेश जारी कर दिया। हालांकि, इसके पहले ही उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया। इसी सियासी भूचाल के चलते 30 जून 2022 को उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद राज्य की कमान एकनाथ शिंदे ने संभाली और देवेंद्र फडणवीस उप-मुख्यमंत्री बने।

विवाद अदालत तक कैसे पहुंचा?
4 जुलाई 2022 को महाराष्ट्र विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ। इसमें एकनाथ शिंदे ने बहुमत साबित किया। शिंदे को सरकार बचाने के लिए 144 विधायकों का समर्थन चाहिए था। फ्लोर टेस्ट के दौरान 164 विधायकों ने शिंदे सरकार के पक्ष में वोट किया। विपक्ष में 99 वोट पड़े और 22 विधायक गैर हाजिर रहे। 

इसके बाद उद्धव गुट ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का रूख किया। चुनाव आयोग ने 17 फरवरी 2023 को अपना फैसला सुनाया। आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दोनों ही एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया। आयोग ने कहा कि शिंदे गुट ही असली शिवसेना है। चुनाव आयोग ने झटका लगने के बाद उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी तेज कर दी।

17 फरवरी 2023 को पीठ ने शिवसेना के उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट की याचिकाओं पर सुनवाई की। 21 फरवरी 2023 से कोर्ट ने लगातार नौ दिन तक यह केस सुना। 16 मार्च 2023 को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इस मामले में कोर्ट ने उद्धव और शिंदे गुट के साथ-साथ केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल का पक्ष भी सुना। 11 मई 2023 को इस मामले में कोर्ट का अहम फैसला आया। 

अदालत ने क्या फैसला सुनाया?
  • शिंदे और 15 अन्य विधायकों को जून 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करने के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। यह अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास तब तक रहेगा, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच इस पर फैसला नहीं सुना देती।
  • फ्लोर टेस्ट को किसी पार्टी के आंतरिक विवाद को सुलझाने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते।
  • तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की थी कि ठाकरे ने विधायकों के बहुमत का समर्थन खो दिया था।
  • कोश्यारी के पास फ्लोर टेस्ट बुलाने के लिए कोई पुख्ता आधार नहीं था। इस मामले में राज्यपाल के विवेक का प्रयोग कानून के अनुसार नहीं था।
  • सदन के स्पीकर का शिंदे गुट की ओर से प्रस्तावित स्पीकर गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त करना अवैध फैसला था। स्पीकर को सिर्फ राजनीतिक दल की ओर से नियुक्त व्हिप को ही मान्यता देनी चाहिए थी।

अभी क्या हो रहा है?
13 अक्तूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष नार्वेकर को 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय करने का आदेश दिया था। इसी आदेश का पालन करते हुए नार्वेकर बुधवार को फैसला देंगे कि बगावत करने वाले 16 विधायक अपने पद पर बने रहने के लिए योग्य हैं या नहीं। 

विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दोनों पक्षों ने 34 अयोग्यता याचिकाएं दायर की हैं। इसमें खुद को असली पार्टी बताने और दलबदल विरोधी कानूनों का हवाला देते हुए दूसरे के विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है। नार्वेकर तय करेंगे कि वैध राजनीतिक दल कौन सा है। इसके आधार पर वह व्हिप जारी करने, स्पीकर के चुनाव और शिंदे सरकार के फ्लोर टेस्ट की वैधता भी तय करेंगे।

फैसले का असर क्या होगा?
फैसला किसी भी दल के पक्ष में हो, लेकिन इसका असर दूरगामी होगा। यदि फैसला शिंदे के पक्ष में आया तो इससे सीएम के रूप में उनकी स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा वह लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे के लिए भी अच्छी स्थिति में होंगे।

अगर फैसला शिंदे के खिलाफ जाता है तो इससे महायुति सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनके पास अजित पवार के विधायकों के साथ भी संख्या बल है। एमएलसी का चुनाव लड़कर शिंदे सीएम का पद भी बरकरार रख सकते हैं। हालांकि, गठबंधन में उनकी भूमिका कम हो जाएगी और विधायकों के उद्धव गुट की तरफ जाने का खतरा भी हो सकता है। 

उधर उद्धव ठाकरे के लिए के लिए भी फैसला काफी अहम होगा। यदि निर्णय उनके पक्ष में आया तो उनका पार्टी में दबदबा बढ़ेगा। हालांकि, विपरीत परिदृश्य में पार्टी कार्यकर्ताओं के शिंदे की पार्टी में जाने का डर रहेगा। 

इसके अलावा भाजपा की बात करें तो उसकी नजर लोकसभा चुनावों की ओर हैं। अजित गुट के साथ होने से सरकार नहीं गिरेगी, लिहाजा देवेंद्र फडणवीस उप-मुख्यमंत्री बने रहेंगे। पार्टी नेताओं का दावा है कि भाजपा का ध्यान अधिकतम संख्या में लोकसभा सीटें जीतने पर है।

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