सार
पिछले करीब 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज एनडीए और नीतीश कुमार के पास अपने शासन की तमाम उपलब्धियां गिनाने को तो हैं, लेकिन इस अवधि की अपनी विफलताओं और जनता की ओर से उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए कोई नया नारा, नया सपना या नया नैरेटिव नहीं है। हालांकि, इसकी काट के लिए जहां महागठबंधन ने सिर्फ घोषणाएं की हैं तो वहीं सरकार में होने की वजह से एनडीए ने कई सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचा भी दिया है।
विस्तार
बिहार विधानसभा चुनावों का घमासान अब अपने चरम पर है। सत्ताधारी एनडीए को अपने कई बार के आजमाए सेनापति मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की साख और लोकप्रियता पर पूरा भरोसा है तो साथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी करिश्मे की ताकत और भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार गृह मंत्री अमित शाह चतुर सुजान रणनीति और अध्यक्ष जेपी नड्डा की संगठन क्षमता की ताकत से उसके समर्थकों और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा हुआ है। मुकाबले में राजद कांग्रेस समेत पांच दलों का गठजोड़ इंडिया महागठबंधन के पास युवा तेजस्वी यादव का चेहरा, राहुल गांधी का सामाजिक न्याय, वामदलों हर विधानसभा क्षेत्र में एक निश्चित जनाधार, मुकेश सहनी और जीके गुप्ता जैसे पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के नेताओं के दलों का पूरा वैचारिक शस्त्रागार मौजूद हैं। इनके बीच में नए महारथी प्रशांत किशोर की पिछले करीब तीन साल की कड़ी मेहनत की परीक्षा भी है।
पिछले करीब 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज एनडीए और नीतीश कुमार के पास अपने शासन की तमाम उपलब्धियां गिनाने को तो हैं, लेकिन इस अवधि की अपनी विफलताओं और जनता की ओर से उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए कोई नया नारा, नया सपना या नया नैरेटिव नहीं है। इसलिए एनडीए ने एक बार फिर बिहार में अपने कई बार सफल हो चुके लालू राज के जंगल राज बनाम नीतीश सरकार के सुशासन राज का नारा आगे बढ़ाया है। लेकिन विपक्षी महागठबंधन ने बिहार में बड़े पैमाने पर व्याप्त बेरोजगारी और यहां के पुरुषों और नौजवानों का काम धंधे और शिक्षा के लिए राज्य के बाहर दूर दराज दूसरे राज्यों में बढ़ते पलायन को अपना मुख्य मुद्दा बनाकर एनडीए के जंगल राज के मुद्दे के राजनीतिक भयादोहन की काट करने में जुटा है।