इस वक्त ईरान और इस्राइल आमने-सामने हैं। दोनों देशों के बीच बढ़ा तनाव दुनिया में एक और युद्ध की आहट दे रहा है। 1 अप्रैल को सीरिया में ईरानी दूतावास पर हुए हमले के बाद ईरान ने इस्राइल पर हवाई हमले किए। इसके पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने कहा कि इस्राइल को उसके ऑपरेशन के लिए दंडित किया जाना चाहिए और किया भी जाएगा। चेतावनी के बाद ईरान ने शनिवार देर रात इस्राइल पर 330 मिसाइलें दागीं। इस दौरान ड्रोन हमले भी किए गए।
अब इस्राइल भी ईरान पर जवाबी कार्रवाई की चेतवानी दे रहा है। उधर ईरान के सर्वोच्च नेता ने कहा है कि इस्लामी दुनिया फलस्तीन की आजादी का जश्न मनाएगी। इससे संकेत मिल रहा है कि क्रिया-प्रतिक्रिया का सिलसिला जल्द थमने वाला नहीं है। आज ईरान और इस्राइल भले ही आमने-सामने हैं लेकिन ये कभी दोस्त हुआ करते थे। रिश्तों में खटास की वजह ईरान की क्रांति को माना जाता है।
आइये टाइमलाइन के जरिए जानते हैं कि ईरान और इस्राइल के शुरुआती रिश्ते कैसे थे? रिश्तों में खटास कब से आनी शुरु हुई? मित्र देशों के बीच दुश्मनी क्यों बढ़ी? ईरानी क्रांति की भूमिका क्या रही है? अब क्या हालात हैं?
- 1948
ईरान और इस्राइल रिश्तों की शुरुआत साल 1948 से होती है। दरअसल, 1948 में दुनिया के नक्शे में इस्राइल नाम के देश का जन्म होता है। इस्राइल की स्थापना के बाद उसे मान्यता देने वाला ईरान तुर्की के बाद दूसरा मुस्लिम-बहुल देश था। उस वक्त ईरान में पहलवी राजवंश का शासन था। इस राजवंश ने आधी सदी से अधिक समय तक शासन किया गया था।
दिलचस्प है कि आज जिस फलस्तीन के साथ ईरान खड़ा है उस फलस्तीन ने ईरान द्वारा इस्राइल को दी गई मान्यता को 'नकबा' यानी तबाही बताया था। फलस्तीन ने इसे तबाही की एक मौन अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति के रूप में देखा। यह सब 1948 में इस्राइल बनने के समय 7,00,000 से अधिक फलस्तीनियों की जबरन बेदखली और विस्थापन की वजह से हो रहा था। - 1968
देश बनने के बाद इस्राइल गैर-अरब राष्ट्रों के साथ संबंध स्थापित करने में तत्पर था। आगे बढ़ते हुए इस्राइल ने ईरान की राजधानी तेहरान में एक दूतावास की स्थापना की। दोनों ने एक दूसरे के यहां अपने राजदूत नियुक्त किए। व्यापारिक संबंध भी बढ़े और जल्द ही ईरान इस्राइल के लिए तेल आपूर्ति का प्रमुख स्त्रोत बन गया। दोनों ने 1968 में एक पाइपलाइन शुरु की जिसका उद्देश्य ईरान के तेल को इस्राइल और फिर यूरोप भेजना था। - 1979
अब वक्त आता है ईरान में इस्लामी क्रांति का और यहीं से शुरु होती है इस्राइल और ईरान की अदावत। ईरान की 1979 में हुई इस्लामी क्रांति ने दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास ला दी। शिया उलमा अयातुल्ला रुहोल्लाह खामेनेई ने ईरान की सत्ता से शाह मोहम्मद रजा पहलवी को बेदखल कर दिया।
इसके साथ एक नए इस्लामी गणतंत्र ईरान का जन्म हुआ और सत्ता पर क्रांति के नेता अयातुल्ला रुहोल्लाह खामेनेई आ गए। ईरान के नए सर्वोच्च नेता खामेनेई ने उस वक्त विश्व शक्तियों को 'अहंकारी' करार दिया और उनके खिलाफत की नीति अपनाई। खामेनेई ने विश्व शक्तियों के क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ खड़े होने का एलान जिसे वह मानते थे कि ये अपने हितों को साधने के लिए फलस्तीनियों सहित दूसरों पर अत्याचार करेंगे।
नई ईरानी सत्ता ने अमेरिका को ईरान में 'महान शैतान' और इस्राइल को 'छोटा शैतान' की संज्ञा दे दी। क्रांति के बाद ईरान ने इस्राइल के साथ सभी संबंध तोड़ दिए। नागरिक अब यात्रा नहीं कर सकते थे और उड़ान सेवा रद्द कर दी गई और तेहरान में इस्राइली दूतावास को फलस्तीनी दूतावास में बदल दिया गया।
खामेनेई ने रमजान के हर आखिरी शुक्रवार को 'कुद्स दिवस' के रूप में घोषित किया। तब से पूरे ईरान में फलस्तीनियों के समर्थन में उस दिन बड़ी रैलियां आयोजित की जाती रही हैं। दरअसल, जेरूसलम को अरबी भाषा में अल-कुद्स कहा जाता है। - 1982
इस तरह से दशकों के दौरान दुश्मनी बढ़ती गई। इस बीच दोनों पक्षों ने पूरे क्षेत्र में अपनी शक्ति और प्रभाव को मजबूत करने और बढ़ाने की भी कोशिश की। बाद में दोनों देशों के संबंध और खराब होते गए क्योंकि इस्राइल ने आरोप लगाया कि ईरान ने सीरिया, इराक, लेबनान और यमन में राजनीतिक और सशस्त्र समूह खड़े किए और उन्हें आर्थिक मदद दी।
ईरान पर आरोप लगता रहा है कि यह लेबनान, सीरिया, इराक और यमन सहित पूरे क्षेत्र के कई देशों में प्रॉक्सी नेटवर्क का समर्थन करता है। इस समूह को 'प्रतिरोध की धुरी' के रूप में जाना जाता है जो फलस्तीनी मुद्दे का समर्थन करने के साथ-साथ इस्राइल को एक प्रमुख दुश्मन मानते हैं। ये सशस्त्र समूह इस्राइल के साथ-साथ अमेरिकी सेना को भी निशाना बनाते हैं। इनमें से मुख्य है लेबनान में मौजूद हिजबुल्लाह, जिसका गठन 1982 में दक्षिणी लेबनान में इस्राइली कब्जे से लड़ने के लिए किया गया था। पिछले कुछ वर्षों में ईरान और इस्राइल के बीच प्रॉक्सी युद्ध बढ़ता गया। - 2023अक्तूबर 2023 में हमास और इस्राइल के बीच युद्ध शुरु हुआ। इसके बाद से हिजबुल्लाह उत्तरी इस्राइल में रॉकेट से हमले कर रहा है। ईरान सशस्त्र हमास का भी समर्थन करता है, जिसने 7 अक्तूबर 2023 को दक्षिणी इस्राइल पर हमला किया था। वहीं मध्य पूर्व में ईरान ने यमन में हूती विद्रोहियों को भी सहायता प्रदान की है। इस समूह ने लाल सागर पर इस्राइली रिसॉर्ट शहर इलियट पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं और शिपिंग जहाजों पर हमला किया है।
- 1 अप्रैल 2024
ताजा विवाद 1 अप्रैल को सीरिया में ईरानी दूतावास पर हुए हमले से उत्पन्न हुआ। दरअसल, इस्राइल का आरोप है कि ईरान लेबनान में हिजबुल्लाह को मिसाइलें और अन्य हथियार भेजने के लिए सीरियाई क्षेत्र का उपयोग करता है। वहीं इस्राइल ने हथियारों की आवाजाही को रोकने के लिए सीरिया में कई हवाई हमले किए हैं। इसी कड़ी में 1 अप्रैल को युद्धक विमानों से सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमला किया गया था। हमले में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) के अल-कुद्स बल के एक वरिष्ठ कमांडर सहित कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई। ये सभी दमिश्क दूतावास परिसर में एक बैठक में भाग ले रहे थे। हमले का आरोप इस्राइल पर लगाया गया, जिसने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली। - 14 अप्रैल 2024
वहीं इसके जवाब में ईरान ने शनिवार रात (14 अप्रैल) इस्राइल पर 330 मिसाइलों से हमला किया। इस दौरान ड्रोन हमले भी किए गए। इस तरह से दोनों देश एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं।
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